कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) द्वारा कर्नाटक को अगले 15 दिनों तक तमिलनाडु के लिए प्रतिदिन 3,500 क्यूसेक पानी छोड़ने का निर्देश दिए जाने के बाद दोनों राज्यों के बीच जल-बंटवारे का पुराना विवाद फिर गहरा गया है। कर्नाटक सरकार का कहना है कि मानसून की कमी के कारण राज्य में सूखे जैसे हालात हैं, जिससे पेयजल, सिंचाई और पशुधन की जरूरतों को पूरा करना ही प्राथमिकता है। इस आदेश के विरोध में बेंगलुरु, मैसूरु, मांड्या और रामनगर सहित कर्नाटक के कई शहरों में प्रदर्शन शुरू हो गए हैं, जहां स्थानीय समूहों ने इस निर्देश को 'अवैज्ञानिक' करार दिया है।
इस निर्देश ने कर्नाटक की प्रस्तावित मेकेदातु बांध परियोजना पर भी राजनीतिक बहस छेड़ दी है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से हस्तक्षेप की मांग की है और स्पष्ट किया है कि इस परियोजना को तब तक कोई मंजूरी नहीं मिलनी चाहिए जब तक यह 2007 के कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण के फैसले और 2018 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुरूप न हो। वहीं, डीएमके के वरिष्ठ नेता टी.के.एस. एलंगोवन ने कहा कि जल-बंटवारे पर निर्णय लेने का अधिकार केवल कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण के पास है और उन्होंने राजनीतिक बातचीत को खारिज कर दिया है।
दोनों राज्यों के बीच यह विवाद अक्सर मानसून के दौरान सामने आता है, क्योंकि दोनों ही राज्य मौसमी बारिश पर निर्भर हैं। तमिलनाडु का तर्क है कि न्यायाधिकरण के अनुसार संकट के वर्षों में आनुपातिक कटौती होनी चाहिए, जबकि कर्नाटक का कहना है कि वर्तमान में जल प्रवाह इतना कम है कि आदेश का पालन करना व्यावहारिक रूप से असंभव है। कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने कहा है कि राज्य सरकार कानूनी विशेषज्ञों से परामर्श के बाद इस निर्देश को कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण के समक्ष चुनौती देगी।
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